militant farmers

छोटे और मझौले भारतीय किसानों के खून चूसने वाले दलाल

भारतीय किसान सहस्रों वर्ष से पिसते आ रहे हैं।पहले मुसलमान आक्रांताओं और शासकों ने इनका खून पिया।उनकी ज़मीनें छीन कर ऐसे लोगों को मनमाने ढंग से दे दिया जो ज़मींदारी, रैयतवारी या फिर महलवारी प्रथा के अनुसार उन्हें नियमित रूप से टैक्स देते रहे। फिर वे अंग्रेजों की गुलामी में पिसे। अंग्रेजों ने मुसलमानो द्वारा अपनाए गए खून चूसने की प्रथा ही कायम रखा।साल १९४७ में विभाजन के बाद देश आज़ाद तो हुआ लेकिन उनके पुरखों से मुसलमान शासकों और अंग्रेज़ों द्वारा छीनी हुई ज़मीन उन्हें नहीं मिला। यहाँ सेपकिस्तान पलायन करने वाले मुसलामानों ने छीनी हुई ज़मीन या तो अपने ही लोगों कोऔने-पौने दामों पर बेच दिया या फिर वक़्फ़ बोर्ड ने उस पर कब्ज़ा कर लिया। उधर दूसरी तरफ अंग्रेज़ी हुकूमत द्वारा जितने ज़मीन उनके मिशनरियों को दिया गया था वह भी उन्हीं के पास रह गया।स्वतन्त्रता के बावजूद पुरखों से छीनी ज़मीन अवैध रूप से लूट-पाट करने वालों के पास ही रह गया। ज़मींदार, रैयतवार या फिर महलवार ही मालिक बन गए।हालांकि कुछ ज़मीनों का बँटवारा भी हुआ लेकिन ज्यादातर ज़मीन उन्हीं लोगो के पास रही। न ही नेहरू और न ही सरदार पटेलइतनी हिम्मत जुटा पाए कि किसानों से छीनी ज़मीन उन्हें वापस की जाए। नेहरू की वोट बैंक वाली नीति भारत पर हॉबी रहा और उन्होंने ऐसा कुछ भी करने से बाज़ किया जिससे उनके वोट बैंक में खलल पहुँचे।

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स्वतन्त्रता के बाद भी किसानों की ज़िंदगी बदत्तर ही रही। फसलों की उपज बहुत ही कम थी।उन दिनों की सरकार ने किसानों के लिएजो भी कदम उठाए वे अपर्याप्त थे।किसान जूझते रहे। कितने ही किसान ज़मींदारों और साहूकारों के क़र्ज़ में बिक गए जिन्होंने उनकी ज़मीनें हड़प ली, अपने कब्जे में ले लिया। इसी के साथ साठ के दशक की अकाल और भूखमरी भी आईं। देश में अनाज की कमी थी। भला हो एम् एस स्वामीनाथन का जिन्होंने कृषि में कुछ बुनियादी सुधारों की पहल की।उन्होंने तत्कालीन सरकार को विश्व में हो रहे ‘हरित क्रान्ति’ को भारत में भी अपनाने का सुझाव दिया। यह उन्हींका प्रयास था जिसे पंजाब में लागू किया गया क्योंकि वहा सिंचाई के साधन उपलब्ध थे। हरित क्रांति में सुझाए परिष्कृत बीज, रासायनिक खाद और पर्याप्त सिंचाई के कारण गेहूँ की पैदावार बढ़ी। धान और तेलहन में ज्यादा वृद्धि नहीं हुईं । याद रहे कि किसी किसान ने हरित क्रांति लाने के लिए सरकार से नहीं कहा था। 

हरित क्रांति का सरकारी कार्यक्रम मध्य ७० के दशक में पूरा हो गया।इसके उपरान्त फसल में लागत का सारा खर्च किसानों को स्वयं उठाना पड़ता था। अक्सर फसल पूरा न पड़ने पर छोटे किसान साहूकारों के क़र्ज़ में डूब कर अपना खेत गँवा बैठते थे और इस तरह कितनों को समय समय पर आत्म ह्त्या भी भी करनी पड़ती थीं। इसीलिए छोटे और मझौले किसान पीछे छूटते गए और बड़े किसान और अमीर होते गए। पंजाब में अबतक तो खेती की ज्यादातर ज़मीन गिने चुने लोगों के पास रह गयीं हैं। जितनों ने अपने ज़मीने गँवाई, उन्होंने अपने लिए कोई और रोजगार ढूंढ लिया…ख़ास कर दुकानदारी, व्यापार, सेना, सरकारी नौकरी, अमीर किसानों के खेत में मज़दूरी या फिर मंडी व्यवस्था में दलाली जिसे एक बेहतर संज्ञा दी गयी है "अढ़तिया"। हरित क्रांति के बाद पंजाब और इससे विभाजित हरियाणा में मंडी के मार्फ़त सबसे ज्यादा खरीददारी होती रही है और इन मंडियों में काम कर रहे अढ़तिया और दलाल लाखों में हैं।इनमें से कुछ लोगों की अपनी खेती भी हैं।

मंडी प्रणाली और समर्थन मूल्य लागू होने के बाद एक और मुश्किल छोटे और मझौले किसानों पर आने लगी। फसल तैयार होने के बाद पंजाब और हरियाणा में फसलों के खरीद फरोख्त में सहायता करने वाले 'अढ़तिया' जिसे 'बिचौलिया या दलाल' भी कहा जाता है, मंडी में एकाधिकार बनाने लगे।उन्होंने अपना एक अलग ही क़ानून बना लिया कि मंडी में सारी खरीददारी उन्हीं के मार्फ़त होगी और इसके लिए उन्हें ढाई प्रतिशत (2.5%) कमीशन मिलेगा। सैकड़ों क्विंटल फसल बेचने वाले अमीर किसानों ने अपना स्वयं का ‘अढ़तिया’ रख लिया।फिर क्या था।इन लोगों ने मंडी पर एकाधिकार जमा लिया। ये पूरी मंडी में अपना ही अनाज बिछाए रखते थे और छोटे एवं मझौले किसानों को अपने फसल बिछाने की इजाजत ही नहीं मिलती थी। वे पूरे के पूरे दिन मंडी के बाहर ही प्रतीक्षा करते और वापस चले जाते थे। इसके बाद इन अमीरों और दलालों ने छोटे एवं मझौले किसानों को मज़बूर कर दिया कि वे अपना फसल अमीरों और दलालों को कम दाम पर मंडी के बाहर ही बेच दें, जिससे उन्हें समर्थन मूल्य मिलता ही नहीं और काफी नुक्सान उठाना पड़ता था। कभी कभार अगर कुछ किसानों ने हिम्मत जुटाकर अपना फसल मंडी में रखने का प्रयास किया भी तो ये दलाल और अमीर किसान, जिन्होंने दर्जनों मज़दूर और बाहुबली लठैत पाल रखे हैं, उस छोटे किसान को धमकाकर ज़बरदस्ती रोक देते। कुछ छोटे किसानों को तो विगत में बुरी तरह पीटा भी गया है।पुलिस खामोश रहती है क्योंकि उन्हें अपना कमीशन मिल जाता है। इस तरहधीरे धीरे अमीर किसानों और दलालों को छोटे और मझौले किसानों की खून चूसने की आदत ही पड़ गयी।

अब जब ये तीन नए क़ानून लाए गए हैं इससे छोटे एवं मझौले किसानों को एक विकल्प मिल जाएगा कि वे अपना फसल किसी औरप्रांत के खरीददार को ऑनलाइन बेच सकेंगेजिसका प्रावधान अब तक नहीं था। ये मूल्य या तो समर्थन मूल्य के बराबर होगा या उससे भी ज्यादा। इससे बड़े किसानों और बिचौलिए दलालों को दो नुक्सान होगा।एक तो अबछोटे एवं मझौले किसानों को अपनी फसलें समर्थन मूल्य से कम में बेचने को वाध्य नहीं कर पाएंगे और दूसरा, जितना फसल मंडी के बाहर बिकेगा उन्हें उसका 2.5% कमीशन नहीं मिलेगा और ये ‘कमीशन-खोर’ नहीं बर्दास्त कर पा रहे हैं।

अभी साल २०२० के खरीफ फसल के सिर्फ धान की MSP खरीद कुल 1,40,078 हज़ार करोड़ रुपयों की हुई है। ‘अढ़तिया’ और दलालों को इसका 2.5% कमीशन मिला होगा जो लगभग ३५०१ हज़ार करोड़ रुपये हैं। यह सिर्फ कमीशन है। छोटे और मझौले किसानों से कम दाम में खरीदकर उसे MSP पर बेचने का इससे भी ज्यादा लाभ होता है। ये मुनाफे किसानों के हाथ मिलने चाहिए था लेकिन इसे दलाल खा रहे हैं। दलालों की यह एक बहुत बड़ी कमाई है जिसका वह टैक्स भी नहीं देते। मुनाफाखोरी की इस कमाई का लगभग आधा तो बिचौलियों के हाथ लगेंगे और बांकी आधा बिचौलियों के छत्रछाया में पल रहे लोगों को जाएगा जिसमें उनके द्वारा पाले गए मज़दूर, बाहुबली लठैत, पुलिस, प्रशासन, गुरुद्वारे, राजनैतिक दल आदि सारे अपना अपना हिस्सा और चन्दा लेने आ जाते हैं। ये सभी परजीवी मिल बाँट कर छोटे और मझौले किसानों का खून चूसते हैं।

यही कारण है कि आज जब केंद्र सरकार ने किसानों कोफसल बेचने के लिए ‘विकल्प’ का अधिकार दिया है तो सारे के सारे परजीवी और रक्तभक्षी आंदोलन पर उतर आए हैं। किसानों की भलाई होने से इन रक्तभाक्षी दलालों की आमदनी कम हो जाएगी। इसीलिए वे इस क़ानून को काला क़ानून कहते हैं और किसी भी कीमत पर सरकार को मज़बूर करने पर आमादा हैं कि यह क़ानून समाप्त हो। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जितने भी किसान संगठन हैं वे प्रमुख अमीरों और दलालों के नाम हैं। यही कुछ लोग वहाँ के सांसद, कौंसिलर, मुखिया या सरपंच भी हैं और सारे अन्य लोगों पर वर्चस्व बनाए हैं।यही कारण है कि ये लोग आज पंजाब और हरियाणा के गाँवों और कस्बों में छोटे और मझौले किसान को धमकी देकर किसान आंदोलन में भाग लेने के लिए मज़बूर कर रहे हैं। हाल ही में पंजाब और हरियाणा के कितने ही इलाकों से खबर आई है कि अगर सभी घरों से आंदोलन के लिए किसान और मज़दूर शामिल नहीं तो उन्हें दण्डित किया जाएगा। यह तो सरासर दादागिरी है। अब यह आंदोलन स्वेक्षा से नहीं वल्कि ज़बरन चलाई जा रही है और राज्य की पुलिस व प्रशासन मूक दर्शक बनी है।

मुख्यतया पंजाब से शुरू हुए बिचौलिये किसान आंदोलन का एक मनोवैज्ञानिक, धार्मिक तथा भौगोलिक दृष्टिकोण भी लगता है। चूँकि अढ़तियों द्वारा अर्जित दलाली के पैसे लगभग सबों को जाता है, यहाँ तक कि गुरुद्वारों को भी, तो सब चाहते हैं कि यह सिलसिला जारी रहे। इसमें पंजाब की सामूहिक मानसिकता सम्मिलित लगती है। चूँकि गुरुद्वारे भी इसका साथ दे रहे हैं, यह प्रदर्शन कहीं न कहीं सिख धर्म से भी जुड़ जाया है और निहंग भी, जिन्हें किसानी से शायद ही कुछ लेना देना हो, इससे जुड़ गए हैं। क्या इसमें अकाल तख़्त की भी सहमति है ? हमें नहीं मालूम, किन्तु अकाली दल तो इसमें अवश्य ही सम्मिलित है। यही कारण है कि लालकिले पर इतने सारे धार्मिक झंडे दीख रहे थे। यही कारण है कि पाकिस्तान और विदेशों में पाकिस्तान समर्थित खालिस्तानी समूह भी साथ दे रहे हैं। बधाई हो पाकिस्तानी ISI तथा उसका साथ दे रहे विदेशी खालिस्तानियों को, कि वैश्यावृत्ति में लिप्त मियाँ ख़लीफ़, रिहाना, थूंबर्ग, मीना हैरिस आदि जैसी बहुतेरे विवादित हस्तियों को भारत के किसान आंदोलन से आमदनी और शोहरत दोनों ही मिल रही है। इससे भारत में रह रहे आंदोलन-जीवी भी प्रसन्न हैं। पाकिस्तान की यह मनसा भी होगी कि इसी बहाने फिर से भारत में खालिस्तानी उग्रवाद शुरू की जाए जो भौगोलिक रूप से भारत को तोड़ने की कोशिष करे। 

हमनें जितने सिख मित्रों से बात की, अधिकतर लोगों के ह्रदय में पंजाब और सिख प्रदर्शनकारियों के प्रति सहानभूति थी। उनमें से कोई भी यह नहीं बता पाया कि इन तीन कानूनों में 'काला' क्या है लेकिन सबों को लगता है कि ये क़ानून वापस लिए जाएँ। एक छोटा किसान, जिसनें अपना नाम बताने से इंकार किया, उदाहरण देकर बताया कि नया क़ानून उनके लिए बहुत ही उपयोगी है। उसने बताया कि मंडी के अढ़तियों और उसके बाहुबलियों ने उन्हें अपना ३० क्विंटल धान मंडी में नहीं बेचने दिया और MSP से बहुत काम दाम पर मंडी के बाहर ही बेचने पर मज़बूर कर दिया। लेकिन उसने यह भी कहा कि क़ानून आने के बाद भी वे दलाल उन्हें अपना फसल ऑनलाइन बेचने नहीं देंगे। ठीक उसी तरह जैसे अभी न चाहनें वाले किसानों को भी प्रदर्शन में भाग लेने के लिए बाध्य किया जाता है। क़ानून लागू होने के बाद भी उन्हें इसी तरह बाध्य किया जाएगा। पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश या फिर और किसी प्रान्त में MSP पर खरीद कर रहे हर मंडी का लगभग यही हाल है। छोटे और मझौले किसानों को अपनी फसल मंडी में बेच पाना टेढ़ी खीर हो गयी है। ज्यादातर ये किसान अपना फसल बिचौलियों या दलालों को बेचने पर मज़बूर हो जाते हैं।इनकी कोई नहीं सुनता। अतः अगर इन्हें ऑनलाइन फसल बेचने की आज़ादी और सहूलियत मिले तो ये ज़रूर उसे अपनाएंगे। लेकिन एक बात और है। ज्यादातर ऐसे किसान ऑनलाइन सुविधाओं से अनभिज्ञ हैं। उन्होंने शायद ही कभी इंटरनेट का उपयोग किया हो। सरकार को उन्हें इन सुविधाओं से अवगत कराना अनिवार्य है।

बिचौलियों द्वारा किसानों के खून चूसने की समस्या धीरे धीरे इतनी भयावह हो गयी है कि समय समय पर सारे बुद्धिजीवी इसके खिलाफ बोलते रहे हैं। कुछ राजनैतिक दल भी इसकी खिलाफत करते रहे और आज जब मोदी सरकार ने किसानों को दलालों से मुक्ति के लिए एक विकल्प दिया है तो किसानों के खून पर पल रहे सभी परजीवी इकट्ठे हो एक स्वर में बोल रहे हैं "किसानों का खून बहुत मीठा है यह स्वाद उनके मुँह से न छीना जाए" । वाह रे किसानों के खून चूस रहे दलाल और उनका साथ दे रहे परजीवी, चाहे वह योगेंद्र यादव, केजरीवाल, राहुल गांधी प्रियंका वाड्रा या और कोई भी हो। उन सबों का आंदोलन अति निंदनीय है।

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